Lessons for the Political Leadership from History

मुग़ल शासक बाबर ने अपनी वासियत में बड़ी अहम बातें लिखीं थी – मेरे बेटे! हिन्दुस्तान में मुख़्तलिफ़ मज़हबों के लोग रहते हैं और ईश्वर की बड़ी इनायत है कि उसने तुम्हें इस मुल्क का शासक बनाया है. अपनी बादशाही में तुम मज़हबी तास्सुब को अपने दिल में हरगिज़ जगह दो और लोगों के मज़हबी जज़बात और मज़हबी रस्मों का ख़याल रखते हुए रुरियायत के बग़ैर सब लोगों के साथ पूरा इंसाफ़ करना।” (The above quoted text has been taken from my friend Raziuddin Aquil’s Blog itihasnama.blogspot.com)

आज भी बहुत ही प्रासंगिक है यह वासियत.

वाक़ई और इससे आज के राजनीतिज्ञों को सीख लेने की ज़रूरत है . हिंदुस्तानी जनमानस जाति और धर्म के बारे में रहकर सोंचता तो है लेकिन ज़्यादातर जनसंख्या ऐसे लोगों की है जो बहलवादी विचारधारा से इत्तेफ़ाक रखती हैकहने का मतलब , मध्यकाल हो या इक्कीसवीं सदी, जनमानस को धार्मिकता पसंद है लेकिन संप्रदायिकता नहीं . इसी बात पर नेहरु और पटेल में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर मतभेद हुआ था . पटेल जूनागढ़ के हिंदुस्तान में शामिल होने के बाद वहाँ की जनता को सोमनाथ को पुनर्निर्मित कर तोहफ़े के रूप में देना चाहते थे . नेहरु का मानना था कि राज्य चूँकि धर्मनिरपेक्ष है इसलिए राज्य को इसकी ज़िम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए और इन धार्मिक मामलों से दूरी बनाकर रखनी चाटिए .

पटेल की मृत्यु के बाद भी नेहरु ने इसी कारण से राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को इसके अनावरण में नहीं जाने की सलाह दी थी, हालाँकि राजेंद्र प्रसाद ने उनकी बात नहीं मानी . परन्तु इतिहास के इन वक़यों से हमें सीख लेने की ज़रूरत है . राज्य के कर्ता धर्ताओ को ये समझना चाहिए की व्यक्ति विशेष के धार्मिक होने में अपराध नहीं है, लेकिन राज्य द्वारा धार्मिकता का बढ़ावा घोर अपराध है और हिंदुस्तान सरीके बहुधर्मीय समाज के लिए विध्वंसक . मुग़लिया शहंशाहों में अकबर इसीलिए सफल रहा और औरंगज़ेब असफल शासक साबित हुआ.

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