दिल्ली विश्वविद्यालय में 1990 के दशक तक एक से चौदह अक्टूबर तक ऑटम वैकेशन की परंपरा थी ।अब तो न हीं ऑटम वैकेशन रहा और न हीं वह हृदययहारी मौसम।अगर दिल्ली में जहरीला स्मॉग इसी तरह जारी रहा और लोग सांस लेने के लिए संघर्ष करते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब लोग शहर छोड़ने पर मजबूर हो जाएं । कहीं कुछ वर्षों में दिल्ली वीरान न हो जाए।

दिल्ली विश्वविद्यालय में स्मॉग की परत
दिल्ली विश्वविद्यालय में 1990 के दशक तक एक से चौदह अक्टूबर तक ऑटम वैकेशन की परंपरा थी । कैंपस कॉलेज के हॉस्टल एवं मुखर्जी नगर व इंदिरा नगर में रहने वाले बीए के सभी विद्यार्थी यह सुनिश्चित करते थे कि वे पंद्रह अक्तूबर के पहले अपने होम टाउन से लौट आएं। वैकेशन खत्म होते ही कॉलेजों में फेस्ट की शुरुआत हो जाती थी क्योंकि इस समय दिल्ली का मौसम बहुत ही अनुकूल और आनन्दमय होता था । अब तो न हीं ऑटम वैकेशन रहा और न हीं वह हृदययहारी मौसम ।
दिल्ली के लिए अक्तूबर एवं नवम्बर के महीने सबसे मनोरम हुआ करते थे । इस मौसम का सभी दिल्लीवासी बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे । इसकी दो वजहें थी । इन महीनों में ना तो एयर कंडीशनर की जरुरत होती थी और ना हीं हीटर की। दूसरा, इस समय उत्तर से ठंढी बयार सी चला करती थी जो पूरी दिल्ली को अपनी मस्त ताज़ा हवा से सराबोर कर दिया करती ।
आख़िर पिछले दस-बारह वर्षों से ही दिल्ली अक्टूबर-नवम्बर के महीनों में प्रदूषण की मार क्यों झेल रही है ?
पहले ज़्यादातर लोग दीपावली में जलाए जाने वाले पटाखों को इसकी मुख्य वजह बताते थे ।परंतु पिछले कुछ वर्षों से तो दीपावली से कई दिन पहले से ही पूरी दिल्ली और आसपास के क्षेत्र स्मॉग की चपेट में आ जा रहे हैं । क्या हमने कभी सोंचा है कि दीपावली में पटाखे जलाने की परम्परा तो बहुत पुरानी है। फिर अचानक दिल्ली प्रदूषण की मार क्यों झेलने लगी है ?
इसमें कोई दो मत नहीं कि पटाखे से प्रदूषण होता है और यह वायुमंडल में भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जित करता है । परन्तु, यह प्रदूषण पहले दिल्ली के आकाशीय क्षेत्र से उत्तर से आनेवाली हवा से दो दिनों बाद ग़ायब हो जाता था । गहराई से अध्ययन करने के बाद यह पता चलता कि इसकी मूल वजह कुछ और ही है ।
क्या है असली वजह ?
एक नवंबर से पंद्रह नवंबर तक दिल्ली में प्रदूषण चरम पर इसलिए होता है, क्योंकि इस समय पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के मामले बढ़ जाते हैं। ऐसा क्यों है ?
दरअसल धरती के गर्भ में संचित जल की तेजी से कमी को रोकने के लिए सरकार ने “पंजाब उप-जल संरक्षण अधिनियम 2009” में पेश किया गया था। इसके अनुसार पंजाब में 15 मई से 15 जून के बीच किसी भी खेत की बुवाई और धान की रोपाई पर रोक है। पंजाब सरकार का यह मानना था कि इन महीनों में अत्यधिक गर्मी पड़ती है और धान की रोपई के लिए काफ़ी जल की आवश्यकता होती है। तात्पर्य यह कि इन महीनों में रोपाई करने से धरती से भूजल निकलना पड़ता था जिससे उसमें भारी कमी हो रही थी, वसूलन इसकी बुवाई इस समय नहीं की जाए।
अधिनियम के अस्तित्व में आने से पहले, पंजाब में किसान मध्य से लेकर अप्रैल के अंत तक धान की नर्सरी बोते थे और मई के मध्य से मई के अंत तक रोपाई करते थे। नतीजतन, धान की कटाई अक्टूबर की शुरुआत में हो जाती थी । 50-60 सेंटीमीटर लंबे खड़े ठूंठ, जो कटाई के बाद बने रहते थे अक्टूबर के मध्य में खत्म हो जाते थे । किसान श्रमिकों की मज़दूरी बचाने के लिए पहले भी इन खेत में खड़े ठूंठ को जला देते थे । परंतु, उन महीनों के दौरान हवा की दिशा पूर्व की ओर नहीं होती थी, और इसीलिए दिल्ली में पहले प्रदूषण कवर का अनुभव नहीं हुआ था।
2009 के बाद, 15 जून से पहले रोपाई की अनुमति न देकर, पंजाब सरकार ने यह सुनिश्चित कर लिया है कि फसल की पानी की आवश्यकता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानसून की बारिश से पूरा हो। लेकिन इससे अब दूसरी और भी भयावह समस्या खड़ी हो गई है ।
देर से रोपाई का मतलब है कि किसान अब अक्टूबर के तीसरे सप्ताह से नवंबर के पहले सप्ताह तक अपने खेतों में आग लगा रहे हैं। उन्हें गेहूं बोने के लिए पंद्रह नवम्बर तक अपने खेत पूरी तरह से तैयार करने होते हैं ।यह रबी की फसल से ठीक पहले और सर्दियों की शुरुआत का समय है, जब हवा की गति बहुत धीमी होती है।अक्टूबर व नवम्बर के महीनों में हवा का रुख़ उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर होता है, जिससे दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में प्रदूषण की परत चढ़ जाती है। निचले वातावरण में नमी का स्तर भी अधिक होता है। यह कम ऊँचाई पर प्रदूषण की एक मोटी परत बनाता है। जले हुए पराली के कण और गैसें, और साथ ही वाहन और उद्योग से निकलने वाला धुआँ आकाश में दूर ऊँचाई पर जाने के बजाय धरती से थोड़े ऊपर हाई आकाश में स्मॉग के रूप में जमा हो जाते हैं।
दिल्ली एनसीआर में फैले जहरीले प्रदूषण के कारण लोगों को साँस और गले में इरिटेशन की शिकायत लगभग आम हो गई है। सरकार को छोटे बच्चों के स्कूल बंद करने पड़ रहे हैं । लोगों को मास्क का इस्तेमाल करना पड़ रहा है । आख़िर कब तक ऐसे रह पाएंगे दिल्लीवासी।
आज के दिल्ली के लगातार बने रहने वाले प्रदूषण एवं धुंध ने 1930 के दशक में अमेरिका के ग्रेट प्लेन्स क्षेत्र में आए “डस्ट बॉल” की यादें ताज़ा कर दी हैं। अमेरिकी सरकार ने ग्रेट प्लेन्स क्षेत्र में विशाल घास के मैदानों को बिना सोचे-समझे गेहूं की खेती के लिए लोगों आवंटित कर दिया, जिससे क्षेत्र की पारिस्थितिक सीमाओं की अनदेखी हुई। अत्यधिक खेती के कारण ऊपरी मिट्टी कमजोर होकर तेज़ हवाओं के साथ उड़ गई। परिणामस्वरूप, धूल के विशाल गुबार कई दिनों तक हवा में छाए रहे, जिससे लोगों के लिए सांस लेना बेहद मुश्किल हो गया। यह समस्या लगभग एक दशक तक चली। इसके कारण कई लोगों को कैलिफ़ोर्निया की ओर पलायन करना पड़ा, जिसे “ओकीज़ माइग्रेशन” के नाम से भी जाना जाता है।
अगर दिल्ली में जहरीला स्मॉग इसी तरह जारी रहा और लोग सांस लेने के लिए संघर्ष करते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब लोग शहर छोड़ने पर मजबूर हो जाएं । कहीं कुछ वर्षों में दिल्ली वीरान न हो जाए।
विपुल सिंह

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