सार: ज़्यादातर ऐसे क्षेत्रों से श्रमिकों का प्रवास हुआ है जहां लगभग पिछले पचास वर्षों से हरित क्रांति अपना सूत्रपात वृहत रूप से नहीं कर पायी । ऐसा इसलिए है क्योंकि नहर जैसे कारक, जो हरित क्रांति की सफलता के लिए महत्वपूर्ण हैं, इन क्षेत्रों में इसकी परिस्थितिकी के कारण नहीं पनप पाए। इसलिए यहाँ के कृषक परिवार पारंपरिक फसल की किस्मों पर ही निर्भर रहे, जिसे बार–बार सिंचाई की आवश्यकता नहीं थी। इन फसलों की पैदावार इतनी अधिक नहीं होती जो पूरे परिवार का भरण पोषण करने में सक्षम हो। वसूलन छोटे भूमिहीन परिवारों से गरीब, भूमिहीन श्रमिकों को काम के लिए औद्योगिक शहरों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
कोविड महामारी की गंभीर चुनौती और इसके प्रसार को कम करने का सबसे व्यावहारिक समाधान पूरे विश्व में लॉकडाउन लागू रहा है। भारत भी इसका कोई अपवाद नहीं है। यहां भी सरकार ने इस तरह का कदम उठाने की अपरिहार्यता को समझते हुए पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा की थी। देश पहले से ही एक आर्थिक मंदी से उबरने के लिए संघर्ष कर रहा था, लॉकडाउन ने एक और झटका दिया, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों के पास शायद ही कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था। लॉकडाउन के नियमों का शहरी मध्य वर्ग ने पूरी ईमानदारी से पालन किया । लेकिन औद्योगिक श्रमिकों और दैनिक वेतन भोगियों की लॉकडाउन को लेकर प्रतिक्रिया बिलकुल विपरीत रही है। श्रमिक अपनी दैनिक कमाई पर निर्भर थे, जो लॉकडाउन के परिणामस्वरूप पूरी तरह से रुक गए थे।
हालांकि सरकार ने राहत पैकेज तैयार किए और विभिन्न स्थानों पर अनाज वितरण की भी व्यवस्था की गयी थी, लेकिन ये श्रमिकों के पूरे परिवार के लिए पर्याप्त नहीं थे। लॉकडाउन की घोषणा के कुछ दिनों के भीतर, कई श्रमिकों ने अपने झोंपड़ियों में खाने के लिए जो कुछ भी बचा था, उसे समाप्त कर दिया था। जब वे खाद्य पदार्थों की तलाश में निकले, तो प्रशासन ने उन्हें नियमों के तहत अनुशासित करने की कोशिश की।
श्रमिकों के विरोध के तरीक़े माध्यम वर्ग से प्रायः अलग होते हैं। उन्हें अपने गांवों में वापस जाने में ही भलाई लगी। यह महामारी द्वारा पैदा हुई कठिनाइयों से बचे रहने का एक तरीका था। अनिश्चितता के माहौल में, ये गरीब कर्मचारी और दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले अपने दूर-दराज के गाँवों में लौटने के लिए बेताब थे, भले ही इसके लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना पड़े। शुरुआत में सभी सरकारी प्रयास इस पलायन को रोकने में विफल रहे, और अंततः श्रमिकों को अपने गाँवों में वापस ले जाने के लिए विशेष श्रमिक ट्रेनें चलानी पड़ीं।
वास्तव में भारत महामारी के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर मानव विस्थापन का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। अगर हम आंकड़ों पर गौर करें तो तालाबंदी के परिणामस्वरूप अपने गाँव लौट रहे अधिकांश श्रमिक बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश लौट रहे थे।
भारत की जनगणना 2001 के अनुसार, उत्तर प्रदेश और बिहार से प्रवासी श्रमिकों की कुल संख्या क्रमशः 2.6 और 1.7 मिलियन है। कुल ग्रामीण से शहरी प्रवास के लिए 2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े यह बताते हैं कि सालाना 50 लाख से 90 लाख के बीच लोग शहरों की तरफ़ रोज़गार की तलाश में गए। इनमें से लगभग आधे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग थे। पिछले कुछ महीनो में लॉकडाउन के बाद हुए पलायन में लगभग 17,48000 और 23,6000 श्रमिक बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के थे। इन प्रवासियों ने दिल्ली, मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों में और आसपास के शहरों में दैनिक काम करने वाले, राजमिस्त्री, रिक्शा चालक और खोमचे लगाने वाले लोग थे।
पलायन के मूल में है हरित क्रांति
महामारी के दौरान श्रमिकों के पलायन की कहानी के मूल में हरित क्रांति है। 1946 में, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना के एक कृषि विज्ञानी का ध्यान जापान में पैदा होने वाले गेहूं की एक बौनी किस्म पर गया। वह इसे अमेरिका लेकर आया। 1953 में, अमेरिकी सरकार ने इस जापानी क़िस्म पर शोध करने के लिए नॉर्मन बोरलॉग को वित्तीय सहायता दी, और तब गेहूं की उच्च उपज वाली किस्म का आग़ाज़ हुआ। होता यह था कि अत्यधिक उपजाऊ मिट्टी में उगाए जाने पर पारंपरिक गेहूं की किस्में लम्बी होती थी और इसलिए गेहूं के दाने आने पर ये झुक जाती थीं। कम ऊंचाई का मतलब था कि अनाज से भरी फसलें वजन के साथ नीचे नहीं झुकती थी। इससे प्रति एकड़ जमीन में अधिक अनाज पैदा होने लगा। 1970 में, नॉर्मन बॉरलॉग को इस चमत्कारी बीज की खोज के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
दरअसल, 1960 के दशक में समाजवादी क्रांति अपने चरम पर थी। उस समय, अमेरिका एक ऐसी रणनीति की तलाश में था जो समाजवादी क्रांति की अपील को कुंद कर दे। इसने इस कार्य के लिए एक रणनीति के रूप में इस नए बीज का उपयोग किया, जिससे कि प्रचुर मात्रा में अनाज का उत्पादन हुआ और विकासशील देशों में फैल रही अशांति थोड़ी कमजोर हुई। इसे हरित क्रांति का नाम दिया गया। भारत जैसे देशों में, जहां भूमि सुधार के विचार व्यापक पैमाने पर गरीबी के समाधान के रूप में लोकप्रिय हो रहे थे, हरित क्रांति ने भूमि सुधार की तत्काल आवश्यकता को राहत प्रदान की। देखा जाए तो यह मूलतः भूमि के पुनर्वितरण के समाजवादी विचार का एक विकल्प था।
उन दिनों भारत के प्रमुख कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन ने सरकार को यह सुझाव दिया कि गेहूं की नई हाइब्रिड किस्म भारत के अनाज की कमी की तात्कालिक समस्या को हल कर सकती है। इसे तेजी से औद्योगिक विकास हासिल करने के साधन के रूप में भी देखा गया। सरकार को भी लग रहा था कि अधिक कुशल कृषि औद्योगीकरण के लिए पूंजी के विकास में सहायता करेगी। जैसी उम्मीद थी 1978 और 1979 के बीच 131 मिलियन टन का रिकॉर्ड अनाज उत्पादन हुआ। भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया। किसान परिवारों की बढ़ी हुई समृद्धि ने ग्रामीण गैर-कृषि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित किया और देश की सकल घरेलू उत्पाद में समग्र वृद्धि हुई। प्रति व्यक्ति आय में भी जबरदस्त वृद्धि हुई। आगे चल कर चावल की भी उन्नत क़िस्म को पूर्वी भारत में समाविष्ट किया गया।
विडंबना यह है कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में हरित क्रांति प्रस्फुटित नहीं हो पायी। इसका एक प्रमुख कारण यह था कि नहर, जिसने पश्चिमी भारत, खासकर पंजाब में हरित क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, यहाँ अनुपस्थित रहे।
दिलचस्प बात यह है कि, 1891 में सिंचाई व्यवस्था को समझने के लिए भारत का दौरा करने वाले ऑस्ट्रेलियाई लोक निर्माण आयुक्त अल्फ्रेड डीकिन ने बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में किसी भी नहर के नहर नेटवर्क के अपने नक्शे में नहीं खींचा था। ऐसा इसलिए था क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने महसूस किया कि इस क्षेत्र में पहले से ही नदियों का जाल था, और इसलिए इसे नहर की सिंचाई की आवश्यकता नहीं थी। इन क्षेत्रों में हिमालय से कई नदियाँ उतर कर गंगा से मिलती हैं। नदियों का यह जाल हर वर्ष बाढ़ आती है । जिन इलाक़ों में बाढ़ बाढ़ का प्रकोप नहीं होता है वहाँ किसानों को मानसून की बारिश पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसा देखा गया है कि हर चार से पांच साल में इस क्षेत्र में सूखा पड़ जाता है।
बड़े भूमि का स्वामित्व रखने वाले परिवार हाइब्रिड बीजों को इस्तेमाल करने में सक्षम थे, क्योंकि वे ट्यूबवेल, ट्रैक्टर, कीटनाशक और उर्वरक का खर्च उठा सकते थे। लेकिन छोटे कृषक परिवार परंपरागत फसल किस्मों पर निर्भर रहे, क्योंकि इस क़िस्म में बार-बार सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती थी । स्वाभाविक रूप से छोटे और मझौले किसानों के समय के साथ बड़े हो रहे परिवार को परम्परागत नस्ल के उत्पादित अनाज पर जीवित रहना मुश्किल था। इसलिए अस्सी के दशक में, ग्रामीण युवाओं को काम के लिए पटना और वाराणसी जैसे शहरों में जाना पड़ा।
यह प्रवृत्ति नब्बे के दशक के बाद दूर के प्रवास में परिवर्तित हो गयी । केंद्र सरकार द्वारा अपनाई गई उदारीकरण नीतियों को अपनाने के बाद, कई उद्योग विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के समर्थन से विकसित हुए। ये उद्योग ज्यादातर दिल्ली, गुड़गांव, नोएडा, पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और मुंबई में विकसित हुए। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के दूरदराज के क्षेत्र, इस विदेशी निवेश से महरूम रहे। वसूलन, गरीब भूमिहीन श्रमिकों और युवाओं को मजबूर होकर काम के लिए औद्योगिक शहरों की ओर पलायन करना पड़ा।
इसी दौरान पटना और मुगलसराय को बड़े शहरों से जोड़ने वाली लंबी दूरी की ट्रेनों में भी वृद्धि हुई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ज्यादातर समय केंद्रीय कैबिनेट में रेल मंत्री बिहार से आते थे। उदाहरण के लिए, रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, और नीतीश कुमार। इन मंत्रियों ने अपने कार्यकाल का उपयोग अपने मतदाताओं को आसान परिवहन प्रदान करने के लिए किया। यह राज्य की निराशाजनक अर्थव्यवस्था का एक आसान समाधान था। इन श्रमिकों द्वारा बड़ी मात्रा में अपने गाँव धन वापस भेजा जाता था, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था चलती रहती थी। आगे चल कर यह एक प्रतिगामी कदम साबित हुआ, क्योंकि इसने अन्य क्षेत्रों में विकास पर राज्य की अर्थव्यवस्था को परजीवी बना दिया।
अब जबकि कोरोनवायरस ने आर्थिक विकास की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में पलायन की स्थिति पैदा कर दी है, सरकार के लिए इन अविकसित क्षेत्रों में उद्योग स्थापित करने को बढ़ावा देने का यह सही समय है। समावेशी विकास के लिए भारत को अपनी वृहद अर्थव्यवस्था पर काम करने का उच्च समय है। दिल्ली, पुणे और मुंबई जैसे बड़े शहरों की आबादी के भारी आबादी के दबाव को कम करने के लिए इन अविकसित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करने की ज़रूरत है।
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