जल इतिहास एवं एंथ्रोपोसीन : पुस्तक समीक्षा                  

Water

पुस्तक समीक्षा                    

विपुल सिंह 

जेरेमी जे. श्मिट, जल: प्रचुरता, कमी और सुरक्षा मानवता के युग में (सेज, नई दिल्ली, 2018), पृ. 308.

सम्पूर्ण विश्व में अब सूखा बार-बार पड़ने लगा है । जलवायु वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप पड़ने वाले प्रकृति के इन अनियंत्रित व्यवहारों को करीब से देखते हैं। जेरेमी श्मिट ने अपनी पुस्तक 1977 के कैलिफोर्निया सूखे के साथ प्रारम्भ की है। उस वक्त जब अमेरिका के पहलेमुख्य जल विज्ञानी लूना लियोपोल्ड से इस मुद्दे को उठाने का अनुरोध किया तब वह – ‘नदियों के प्रति सम्मान’ और ‘जल प्रबन्धन’ जैसे समाधान के साथ आए। यह पुस्तक उक्त तथ्य के बिलकुल विपरीत स्थिति लेती है, और तर्क देती है कि दुनिया में जल की बहुत सारी समस्याएं ‘जल प्रबन्धन के दर्शन’का परिणाम हैं। जेरेमी श्मिट का मुख्य तर्क पॉल क्रुटजेन और यूजीन स्टोइमर द्वारा  लोकप्रिय एंथ्रोपोसीन के इक्कीसवीं सदी के विचार के इर्द-गिर्द घूमता है। एंथ्रोपोसीन का मुख्य सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि मानव और उनकी गतिविधियों ने पिछली दो शताब्दियांे से प्रकृति को प्रभावित किया है। मानवजनित या मानव प्रेरित परिवर्तनों के बारे में बहस करते समय एंथ्रोपोसीन सैद्धान्तिक रूप से इस बात पर जोर देता है कि व्यक्ति और राज्य दुनिया के भविष्य के लिए एक सामूहिक जिम्मेदारी देते हैं।

वैचारिक रूप से, निहित प्रस्ताव यह है कि प्रकृति में पहले से ही अज्ञात परिवर्तन लाने के लिए उसी बल को आने वाली पीढ़ियों के लिए एक दुनिया बनाने के लिए विनियमित किया जा सकता है। इसी अनुक्रम में, जेरेमी श्मिट यह बताते हैं कि कैसे जल को भी संसाधन के रूप में देखा जाने लगा। चूंकि संसाधनों को प्रायः राज्य से सम्बन्धित माना जाता था, इसलिए किसी भी अन्य संसाधनों की तरह जल को भी प्रबन्धित करने की वस्तु माना जाता था। लेकिन जब हमने ऐसा किया, तो इसने हमारे “लोगों पर शासन करने की अभिवृत्ति” (12) को प्रभावित किया। अपने कथन को सिद्ध करने के लिए, उन्होंने बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दिनों में प्रचलित शासन के विचार का पता लगाया है। यह वह समय था जब डब्ल्यू. जे. मैकगी का जल प्रबन्धन और संरक्षण का सिद्धान्त बहुत लोकप्रिय हुआ था। मैकगी ने स्पष्ट रूप से प्रचारित किया कि जल ‘एक संसाधन’ (79) है। धीरे-धीरे, संयुक्त राज्य अमेरिका के लोग सभी संसाधनों को राज्य की निगरानी में लाने की आवश्यकता के बारे में आश्वस्त थे। यह सब भूमि और जंगल पर शासकीय नियमन से प्रारम्भ हुआ, और धीरे-धीरे जल भी मात्रात्मक दृष्टि से निश्चित और नियंत्रित होने लगा। जल को नियंत्रित करने का एक सामान्य सूत्र ‘वैश्विक जलअभिशासन’(Global Water Governance) के रूप में एक शताब्दी बाद स्पष्ट हुआ (88)। इसलिए जैसा कि जल प्रबन्धन के बारे में जल वैज्ञानियों के बीच विश्व स्तर पर स्वीकार किए गए विचार के विपरीत, इस पुस्तक से पता चलता है कि जल की कई समस्याएं जल प्रबन्धन के दर्शन का परिणाम है। श्मिट जल प्रबन्धन के दर्शन की उत्पत्ति को 1885 से चिन्हित करते है जब यह प्रारम्भ में चालर््स लेल द्वारा होलोसिन अर्थात अन्तिम हिम युग के बाद से एक ग्रह की स्थिति के रूप में व्यक्त किया गया था। (पृ. 8) उनका तर्क है कि यद्यपि एंथ्रोपोसीन एक ऐसी अवधि को अनुकूलित करने के लिए अस्तित्व में आया, जिसमें मानव भूवैज्ञानिक प्रक्रिया में भी बहुत परिवर्तन करता है, लेकिन धीरे-धीरे भू-प्रणाली (Earth System) पर मानव गतिविधि के मात्रात्मक प्रभावों की अवधारणा के प्रयास किए गए। इस प्रकार, एंथ्रोपोसीन की अवधारणाओं ने एक वर्णनात्मक अभिव्यक्ति निर्धारित की थी जिससे प्रकृति पर शोध करने वाले विद्वान बच नहीं सकते थे। इसने ‘अन्तःविषय वैज्ञानिक नेटवर्क’ की ओर अपना मार्ग बदल दिया, जो जल को भू-प्रणाली के हिस्से के रूप में ही समझता था (पृ.12)। “साधारण जल” की विस्तृत कहानी ने पहली बार यह बताया था कि पहले जल “प्रचुर मात्रा में” उपलब्ध था, परन्तु, अब कुप्रबन्धन के कारण ‘दुर्लभ’ हो गया है, और मानव के विकास और स्वास्थ्य को लेकर उत्पन्न होने वाले अन्तरराज्यीय संघर्ष से बचने के लिए जल का कुशल प्रबन्धन अब आवश्यक हो गया है (पृ. 41)।

यह पुस्तक जेम्स स्कॉट के सीइंग लाइक ए स्टेट की ओर संकेत करती है जिसका बल इस बात पर है कि ‘उच्च आधुनिकतावाद’ ने प्रकृति को प्राकृतिक संसाधनों में परिवर्तित कर दिया। जल से सम्बद्ध पूर्व-आधुनिक समझ को नौकरशाही की पारखी नजर समझ पायी, जिसने ‘वैज्ञानिक तर्कसंगतता के आधार पर लेखांकन के नए रूपों’ को स्थापित किया (पृ. 28)। टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA) ‘उच्च आधुनिकतावाद’ का जल-विभाजक क्षण था, जब बांधों के निर्माण और बिजली के उत्पादन को महत्त्वपूर्ण रूप से देखा गया था, और ‘जल की आपूर्ति के विज्ञान का धन के विज्ञान के साथ तेजी से गठबंधन किया गया था’ (पृ. 114)। जेरेमी श्मिट यह दिखने का प्रयास करते हैं कि कैसे टी.वी.ए. दुनिया भर में जल प्रबन्धन के मामले में अनुसरण करने के लिए एक मॉडल बन गया है। मॉडल इतना प्रभावशाली था कि इसे सभी अन्तर्राष्ट्रीय जल-विभाजक कार्यक्रमों के लिए खांका माना जाने लगा। जेम्स स्कॉट ने इस तरह के ‘गोद’ लेने पर आगाह किया है और कहते हैं कि यह “एक ऐसी इच्छा है,जिसके घातक दोष हैं”।

जेरेमी श्मिट यह भी लिखते है कि कैसे टी.वी.ए. ने दुनिया के सामने विकासशील देशों के लिए एक ऐसा जिसमें यह बताया गया मॉडल प्रस्तुत किया कि उनके प्रचुर मात्रा में उपलब्ध जल को एक सम्पत्ति के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इसका मुख्य जोर आपूर्ति-पक्ष के जल प्रबन्धन पर था क्योंकि यह ‘भौतिक धन प्रदान करेगा’ और ‘ अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय प्रतिपालकों को उन्हें बनाने के लिए आवश्यक ऋण से किराए को निकालने का अवसर ’ प्रदान करेगा (पृ. 114)। उसका कहना है कि डेविड लिलिएनथल ने इस नए ‘अमेरिकी उदारवाद’ को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न विकासशील देशों की यात्रा की (पृ. 114)। यही कारण है कि 1951 में कई अन्य यात्राओं के बीच, ‘मिस्टर टी.वी.ए.’, (लिलिएनथल का उपनाम) ने सिन्धु बेसिन का भी दौरा किया, जो भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का एक हिस्सा था, और उन्होंने प्रस्ताव दिया कि टी.वी.ए. मॉडल को “राजनीतिक संकट को रोकने के लिए” लागू किया जा सकता है (पृ. 11)। यह ध्यान किया जा सकता है कि शीत युद्ध के वर्षों के दौरान, ‘संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ ज्यादा से ज्यादा विकासशील देशों को अपने अपने पक्ष में लाने के लिए बाँधों को सबसे अधिक उपयोगी मानने लगे थे (जॉन मेकनील, समथिंग न्यू अंडर द सन, न्यूयॉकः डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन, 200)। संयुक्त राज्य अमेरिका ने टी.वी.ए. मॉडल को बढ़ावा दिया और विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं के माध्यम से एशियाई और दक्षिण अमेरिकी देशो के कई बांध निर्माणों को वित्तीय सहायता प्रदान करवाई। इस प्रकार, बांधों ने न केवल अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिपालकों को उन्हें बनाने के लिए दिए गए ऋण से हितों को निकालने की अनुमति दी बल्कि इसके माध्यम से ‘कम्युनिस्टों की सभी सामाजिक निर्दयता को दूर करने’ का प्रयास भी किया गया था (पृ. 10)। शीघ्र ही अर्थशास्त्री, इन्जीनियर, कृषिविद और योजनाकार, जिन्होंने टी.वी.ए., अमेरिकी कृषि विभाग या ट्रेजरी विभाग में कार्य किया था, वो विभाग संयुक्त राष्ट्र को स्थानान्तरित हो गए। ‘मेटीस’ को दबाने के लिए राज्य द्वारा ‘टेकने’ को तैनात किया गया था। अर्थात कौशल और ज्ञान कई वर्षों के अभ्यास के माध्यम से हासिल किया गया। बांधों के बुरे प्रभाव को सम्पूर्ण विश्व में शीघ्र ही महसूस किया जाने लगा। एक और महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व, जिसने संयुक्त राज्य अमेरिका और बाद में दुनिया के बाह्य हिस्सों में जल प्रबन्धन की समझ को बदल दिया, वह हैं गिल्बर्ट एफ. व्हाइट, जो मानते थे कि आपूर्ति पक्ष प्रबन्धन के अतिरिक्त ‘जल और मांग की गतिशीलता’ भी महत्त्वपूर्ण हैं। 1992 में, पर्यावरण और विकास पर एकीकृत जल संसाधन प्रबन्धन (IWRM) और संयुक्त राष्ट्र का संयुक्त सम्मेलन “जल की कमी” से जुड़ा था (पृ. 155)। यह “वैश्विक विकास संभाषण” (पृ. 60) में सर्वोच्च बन गया और सम्पूर्ण विश्व में इसे संस्थागत बना दिया गया। यह तब हुआ जब जल तेजी से ‘आर्थिक वस्तु’ बन गया।

अपनी पुस्तक के अन्तिम खण्ड में जेरेमी श्मिट हमें एंथ्रोपोसीन के मुद्दे पर वापस लाते हैं और आशा करते हैं कि हम जल को एक संसाधन के रूप में देखना भूल जाएंगे। वह सुझाव देते हैं कि हम आज की जल की समस्याओं  से निपटने के लिए परम्परागत व्यवस्था को बदल सकते हैं। वह एल्डो लियोपोल्ड का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने पर्यावरण के लिए संसाधनों, संरक्षण और मानव सम्बन्धों को अलग तरह से देखा। लियोपोल्ड के लिए, “भूमि” केवल शाब्दिक अर्थ में भूमि नहीं थी, लेकिन इसमें“जल, पौधे और जानवर” सभी सम्मिलित थे। इस प्रकार ‘भूमि’ (पृ. 216) की श्रेणी में सब कुछ समाहित किया गया। लियोपोल्ड कहते हैं कि हम इन सभी प्रणालियों का प्रबन्धन कर सकते हैं, लेकिन यह भी जरूरी है कि हम जंगली घास से लेकर पौधों तक यानि पारिस्थितिक तंत्र के प्रत्येक हिस्से को संरक्षित रखें। श्मिट, लियोपोल्ड की पारिस्थितिक सोच की वकालत करते हैं, जिसमें सभी प्रजातियां और जीव “हमारे साथ भूमि साझा करने के हकदार थे” (पृ. 18)।

श्मिट ने विभिन्न प्रकार की स्रोत सामग्री का उपयोग किया है और उनकी पुस्तक इस प्रकार बहुत आकर्षक है। यह पर्यावरण के इतिहास, विशेष रूप से जल इतिहास के क्षेत्र में काम करने वाले शोधार्थियों  के लिए रुचिकर होगी।

 

 

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