विपुल सिंह

आधुनिक विश्व में हम कई प्रकार की प्रकृति सम्बंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। पार्यावरण इतिहास इन समस्याओं को ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में समझता है। इतिहास की इस नई विधा में हाल के दिनों में ‘एंथ्रोपोसीन’ शब्द काफी प्रचलित हुआ है । इस शब्द को प्रायः मानव द्वारा पर्यावरण पर पड़ रहे प्रभाव से जोड़ा जाता है।हालाँकि मानव प्रभाव विश्व पटल पर कब सबसे विध्वंशक हुआ इसको लेकर इतिहासकारों के बीच विवाद है। परन्तु जो सबसे मान्य विचार है, वह है कोलम्बस द्वारा ‘नए विश्व’ यानि अमरीका की खोज। इसने ने केवल ‘पुराने विश्व’ को ‘नए विश्व’ से जोड़ा, और कई प्रकार के आदान-प्रदान को आगे बढ़ाया, बल्कि यूरोपीय राष्ट्रों के बीच उपनिवेश स्थापित करने के लिए होड़ लगा दी। अब यूरोप के कई देश अपने संसाधनों के उपयोग की बजाए नए अधिकृत क्षेत्रों के संसाधनों का दोहन करने लगे। धीरें-धीरें पिछले पॉच सौ सालों में मानव के द्वारा प्रकृति का दोहन अपने चरम पर पहुँच गया है। परिणामस्वरूप आज हम ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं । और इन सभी का जिम्मेवार मनुष्य स्वयं है।
गांधी जी ने हालाँकि कभी भी पर्यावरण इतिहास के इन आधुनिक शब्दावलियों का इस्तेमाल नहीं किया, परंतु उनके लेखन-संग्रह और हिन्द स्वाराज को ध्यानपूर्वक पढ़ने से ज्ञात होता है कि वे बीसवीं सदी के शुरूआती बर्षों में ही इन भविष्य की समस्याओं को भांप चुके थे और उसका पूर्वानुमान लगा चुके थे। उनका यह प्रसिद्ध व्यक्तव्य उनके पर्यावारण की समझ को दर्शाता है- ‘’पृथ्वी सभी मनुष्यों की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है, लेकिन लालच पूरा करने के लिए नहीं’’।
गांधी ने बीसवीं सदी के शुरूआत में ही हमें अगाह कर दिया था कि एक ऐसा वक्त आएगा जब अपनी जरूरतों को बढ़ानें की अंधी दौड़ में लगा मनुष्य अपने किए हुए को देखेगा और पछताएगा कि ये हमने क्या किया। गांधी को हम उनके सत्याग्रह और अहिंसावादी आन्दोलनों के लिए अधिक जानतें है, परन्तु उनके प्रयोग कई मायनों में बिना पर्यावरण आंदोलन की बात किए उस ओर इशारा करते है। गांधी के इन अप्रत्यक्ष विचारों को सबसे पहले एक नोर्वे के विद्वान अर्ने नीस ने पहचाना। इससे पूर्व दर्शन के ‘गहन पारिस्थितिकी’ को रेचल कार्सन ने “साइलेन्ट स्प्रिंग” में भी दर्शाया है। रेचल कार्सन ने इस पुस्तक में डी डी टी के प्रयोग का मछिलयों पर प्रभाव और इसके द्वारा अन्य जल प्राणियों एवं एवं मनुष्य पर दूरगामी प्रभाव दिखाया है जिसने पूरे अमरीका में १९६० के दशक में सनसनी फैला दी थी। अर्ने नीस को ‘गहन पारिस्थितिकी’ का प्रणेता माना जाता है। नेस का यह मानना है कि पर्यावरण से संबंधित जो आंदोलन आज हम देख रहे है है- जैसे कार्बन उर्त्सजन, प्रदूषण या फिर संसाधनों के दोहन के खिलाफ आंदोलन – ये मूल रूप से सतही हैं। नेस इसे सतही इसलिए मानते हैं क्योंकि यह पूरी तरह से मनुष्य के प्रकृति से संबंध पर अधारित है। या यूँ कहें कि मनुष्य के लिए हो रहे खतरों को कम किया जा सके। ‘गहन पारिस्थितिकी’ इस प्रकार के आंदोलन के विपरीत प्रकृति के सभी जैविक प्राणियों के स्वास्थय एवं प्रभाव की बात करता है।
नेस कहते है कि गांधी की प्रकृति को लेकर सोंच गीता के दर्शन से मिलता-जुलता है जिसमें सभी जीवों के बीच आपसी निर्भरता व संबंध की बात की गई थी। यदि हम हिन्द-स्वराज को ध्यानपूर्वक पढ़ें तो हम पाते है कि गांधी साधन, साध्य एवं मानव के अधिकार व कर्तव्यों के बीच सम्बंधों की बात कर रहे है। उन्होनें इस पुस्तक में मानवजीवन से जुड़े कुछ आधारभूत मुद्दों को उजागर किया है। आज जब हम सतत विकास की बात 21वीं सदी में कर रहे है। गांधी जी ने इसको 20वीं सदी में ही भांप लिया था। वे कहते हैं कि अगर हम इच्छा रखें कि हम भारत को इंग्लैण्ड और अमरीका बना देंगे तो हमे शोषण के लिए पृथ्वी पर कोई अन्य नस्ल और स्थान तलाशना होगा। यंग इंडिया में तो उन्होंने यहाँ तक लिखा था की भगवान को भारत कभी भी पश्चिम की तरह औद्योगिकीकरण न करे क्योंकि इंग्लैण्ड जैसे एक छोटे द्वीप की राजशाही के आर्थिक साम्राज्यवाद ने विश्व को जंजीरों से बाँधे रखा है। भारत जैसा ३० करोड़ आबादी का देश अगर एस प्रकार के आर्थिक शोषण की शुरुआत कर दे, तब धरती टिड्डियों की तरह अनावृत हो जाएगी ।
गांधी जी ने शहरवाद और उधोगवाद की समस्या का भी समाधान दिया है, जहाँ आर्थिक विकाश गाँवों पर केंद्रित हो । उन्होंने आदर्श गाँवों की व्याख्या करते हुए यह लिखा – ‘इसमें रोशनदार और उपयुक्त रोशनी आनेवाली झोपड़ी होंगी जिनका निर्माण पाँच मील के भीतर से लायी गयी सामग्री से हो। झोपड़ी में आँगन हो जहाँ परिवार के लोग धरेलू उपयोग के लिए सब्ज़ियाँ रोप सकें तथा मविशियों को रख सकें’। यद्यपि गांधी जी ने सीधे तौर पर वर्तमान की प्रचलित पर्यावरण संरक्षण जैसी शब्दावली का तो कभी उपयोग नहीं किया, लेकिन उनके कार्य और दर्शन इस विचार से काफ़ी निकटता रखते हैं। वे कहते हैं कि तुरंत फ़ायदे के लिए कृषि में मिट्टी की उर्वरता से खिलवाड़ विपदाकारी होता है और आगे चल कर कृषि उत्पादन में गिरावट आती है। इसलिए इसके जगह गांधी जैविक खाद के उपयोंग को प्राथमिकता देते हैं, जो ना केवल मिट्टी को समृद्ध बनाती है एवं फसलों की पैदवार बढ़ाती है, बल्कि विदेशी मुद्रा की भी बचत करती है।
इस प्रकार पर्यावरण के सम्बंध में गांधी जी के दर्शन का गहरा निहितार्थ है । इसलिए गांधी आज भी प्रासंगिक हैं । उनके द्वारा अपनाए गए प्रयोगों के मूल में मनुष्य की पर्यावरण के प्रति जिम्मेवारी और सभी प्रकार के जीव-जन्तुओं और पेड़-पैधों के प्रति प्रेम रखना है। उनकी पर्यावरण एवं नैतिकता की समझ काफ़ी गहरी थी, जो हम आज के आधुनिक पर्यावरण की शब्दावलियों एंथ्रोपोसीन एवं गहन पारिस्थितिकि के रूप में पढ़ते हैं।

Leave a comment