पर्यावरण इतिहास ज्ञान की वह धारा है जो मनुष्य के आपसी और सामुदायिक रिश्तों को प्रभावित करने वाली प्रक्रियाओं का विवेचन करती है, मानवीय रिश्तों को प्रभावित करने वाले ऐतिहासिक घटनाक्रमों के प्रकृति एवं पर्यावरण पर दूरगामी असर को जानने-समझने की कोशिश करती है। इस तरह पर्यावरण इतिहासकार मनुष्य और उसकी संस्थाओं, मसलन, राज्य, राजतंत्र, औपनिवेशिक साम्राज्य वगैरह द्वारा किये गये बदलावों के असर का भी मूल्यांकन करते हैं। यानी इतिहास लेखन की हर विधा की तरह पर्यावरण इतिहास समाज एवं अर्थव्यवस्था में हुए बदलावों पर तो गौर करता ही है, इन परिवर्तनों के प्राकृतिक वातावरण पर पड़े प्रभाव का भी अध्ययन करता है और इन बदलावों को ऐतिहासिक क्रम में पिरोता है। डोनाल्ड वस्र्टर अपनी पुस्तक ‘द एंड्स ऑफ द अर्थ’ में लिखते हैं कि पर्यावरण इतिहास हमें अतीत को देखने की नई दृष्टि प्रदान करता है और उसमें हमारा नजरिया बदल देने की की अद्भुत क्षमता है। वे कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में विकसित सामाजिक इतिहास की धारा से जैसे इतिहास के अध्ययन में क्रांतिकारी परिवर्तन आ गया है, उसी तरह पर्यावरण इतिहास भी यह उद्घाटित करता है कि विशाल साम्राज्य की महत्वाकांक्षाओं और विस्तार की योजनाओं ने पृथ्वी के वातारण को कितना नुकसान पहुंचाया है।
यह भी कहा जा सकता है कि पर्यावरण इतिहास किसी परिभाषित सिद्धांत की कसौटी पर ऐतिहसिक घटनाक्रमों को समझने की कोशिश नहीं करता है, बल्कि यह अतीत एवं वर्तमान के बीच एक संवाद की स्थिति बनाता है, ताकि भविष्य के लिए कोई दिशानिर्देश भी मिल सके। यह विचारधाराओं के परे एक ऐसे भविष्य की परिकल्पना करता है जिसमें पृथ्वी की तेजी से बढ़ रही पारिस्थितिक दुर्दशा पर काबू पाया जा सके। पर्यावरण इतिहास कई बार परिवर्तन की कहानी के साथ-साथ मानव समुदाय की परंपरागत प्रथाओं से मनुष्य के दूर चले जाने के प्रभाव का भी अध्ययन करता है। इतिहास अध्ययन की यह नई विधा अपने इसी स्वरूप के कारण मुख्यधारा के इतिहास विभाजन को भी चुनौती दे रही है। यानी इसमें मानव समाज के इतिहास को कालखंड के आधार पर प्राचीन, मध्य एवं आधुनिक जैसे खांचों में बांटने के बदले विषय के आधार पर अलग करने पर जोर है। इसमें इतिहासकार की दिलचस्पी समय और स्थान के परिपे्रक्ष्य में बड़े परिवर्तनों को बतलाने में होती है। इस क्रम में उसे कई विषयों का सहारा लेना पड़ता है, मसलन, भूगोल, अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, मानव-विज्ञान, राजनीतिशास्त्र इत्यादि।
जॉन मैकनिल कहते हैं कि सदियों से इतिहासकारों का व्यवहार ऐसा रहा है जैसे कोई नशे में धुत आदमी अपनी कार की खोई चाभी सड़क पर बिजली के खंभे की रोशनी में तलाश रहा हो। वह आदमी ऐसा इसलिए नहीं करता है क्योंकि वहीं चाभी खोई है, बल्कि इसलिए करता है क्योंकि वहीं रोशनी है। कहने का मतलब यह कि पर्यावरण इतिहासकार को अधिक आसान और स्पष्ट क्षेत्रों की बजाय नये अंधेरों में जाने का मौका मिलता है जिन पर अभी तक रोशनी नहीं पड़ी है। इसी वजह से वह इतिहास के ऐसे पहलुओं को खोज निकालता है, जिन्हें जानकर हम चैंक उठते हैं। [ जे. आर. मैकनिल, ‘ड्रन्क्स, लैम्पपोस्ट एंड एनवायर्नमेंटल हिस्ट्री’, एनवायर्नमेंटल हिस्ट्री, v.10, no.१ (जनवरी २००५), पृ. 64. ]
हालांकि मुख्यधारा के इतिहासकार पारिभाषित सीमाओं के बाहर इतिहास को समझने की कोशिशों की आलोचना करते हैं। कई बार तो इसे सतही तौर पर लिखा गया इतिहास भी कहा जाता है। इतिहास के तहत दूसरे विषयों के विपरीत, पर्यावरण इतिहास को एक विशेष कठिनाई भी झेलनी पड़ती है। उदाहरण के लिए, लैंगिक इतिहास का कोई लेखक इतिहास के पारंपरिक तरीकों को इस्तेमाल कर पाता है। बेशक, उसका विषय अलग है, लेकिन समाज और समस्याओं को समझने के बुनियादी तारीके मानविकी और समाज विज्ञान के ही होते हैं। इस तरह लैंगिक इतिहास का शोधकर्ता एक परिचित जमीन पर काम कर रहा होता है। लेकिन पर्यावरण इतिहासकार को प्रासंगिक साहित्य एवं अभिलेखीय सामग्री को समझने में सक्षम होने के लिये प्राकृतिक विज्ञान के विषयों से भी परिचित होना पड़ता है। इसके अतिरिक्त उसे वैज्ञानिक मानदंडों और दर्शनों को भी समझना होता है। इस प्रकार पर्यावरण इतिहासकार के लिये स्रोत समाग्री मौखिक इतिहास एवं लिखित दस्तावेजों से लेकर विज्ञान के आंकड़ों मसलन प्रदूषण के स्तर वगैरह तक फैली होती है।
मेरा यह मानना है कि पारंपरिक इतिहास के बदले पर्यावरण इतिहास के शोधकर्ताओं को प्राकृतिक विज्ञान एवं समाज विज्ञान के बीच संबंधों को समझने का ज्यादा प्रयास करना पड़ता है और समय लगाना पड़ता है क्योंकि ये दोनों विधाएं मूल रूप से भिन्न-भिन्न हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि पर्यावरण इतिहास के शोधकर्ताओं को इस प्रयास में इतिहास की मुख्यधारा एवं विज्ञान दोनों की आलोचना और उपेक्षा झेलनी पड़ती है। विज्ञान की हेकड़ी तो समझ में आती है, लेकिन समाज विज्ञान की नाराजगी थोड़ी अजीब लगाती है। संभवतः इसकी बड़ी वजह यह है कि समाज विज्ञान के विद्वानों जैसे, एडम स्मिथ, कार्ल माक्र्स, मैक्स वेबर की उत्कृष्ठ कृतियों में प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण पर कुछ भी नहीं कहा गया है।
हालांकि पर्यावरण इतिहास के लिए यह आवश्यक है कि कार्ल माक्र्स व मैक्स वेबर की परिभाषाओं को पर्यावरण से जोड़कर देखा जाए। उदाहरणार्थ, पूंजीवाद मजदूरों के भयंकर शोषण के साथ-साथ प्रकृति का भी बुरी तरह से दोहन करता है जिसके दूरगामी परिणाम झेलने पड़ते हैं। उसी तरह माइकल फूको के ‘समसामयिक इतिहास’ के संदर्भ में हमें रूढि़वादी और उदारवादी सोच की चिकनी चुपड़ी बातों के विपरीत वर्त्मान से संबंधित उन मुद्दों को उजागर करने की आवश्यकता है जिसने प्रकृति का सत्यानाश किया है। पर्यावरण इतिहास के पैरोकार ऐसा मानते हैं कि पर्यावरण इतिहास लिखने की स्रोत सामग्री लंबे समय से मौजूद रही है, लेकिन इनका महत्व हाल के अनुभवों के बाद अधिक उपयोगी लगने लगा है। फ्रांस में १९२९ में शुरू किये गए अन्नाल्स जर्नल में इसके संस्थापक मार्क बलॉक एवं लुशन फेब्रे समाज से प्रकृति के रिश्ते की चर्चा करते दिखते हैं। आगे चलकर फर्नांड ब्रॉदेल ने भी यह माना कि पहाड़, मैदान, भूमि एवं समुद्र ने मनुष्य के जीवन को लंबे समय से प्रभावित किया है जिसे वे लांग ड्यूरी कहते हैं। इसी अन्नाल्स स्कूल के विद्वान इमैनुएल ले रॉय लादुरी ने १९७४ में लिखा कि पर्यावरण इतिहास पुराने प्रसंगों को वर्त्मान इतिहास लेखन के नए मुद्दों से जोड़ता है। उदाहरण के लिए अकाल, महामारी, बाढ़, नदियां, जलवायु, इत्यादि जैसे पुराने प्रसंगों को हम औद्योगीकीकरण, उपनिवेशवाद, या जनसंख्या वृद्धि से जोड़ कर देखने लगे हैं। ले रॉय लादुरी इसे ‘हिस्टॉयर इकोलोजिक’ (पारिस्थितिक इतिहास) की संज्ञा देते हैं। [ डोनाल्ड वर्स्टर, ‘डूइंग एनवायर्नमेंटल हिस्ट्री’, द एंड्स ऑफ द अर्थ: पर्सपेक्टिव्स ऑन मॉडर्न एनवायर्नमेंटल हिस्ट्री, (न्यू यॉर्क , १९८८) पृ. २९० में वर्णित। ]
डोनाल्ड वस्र्टर भी इतिहास के चारों तरफ दीवार खड़ी करने के विरोधी हैं। वे कहते हैं कि ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने पत्थर पर लकीर खींच दी है कि जल-चक्र, वनों की कटाई, जानवरों की आबादी, मिट्टी की पोषकता इत्यादि विषय विज्ञान के लिए आरक्षित हैं, जबकि इतिहास को कर, कूटनीति, राजनीती, संघर्षों, समाज एवं संस्कृति तक सीमित रखना होगा। [ डोनाल्ड वर्स्टर, द टू कल्चर रिविजिटेड: एनवायर्नमेंटल हिस्ट्री एंड एनवायर्नमेंटल साइंसेजश्, एनवायरनमेंट एंड हिस्ट्री, २(१९९६), पृ. ५.]

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